खुद से मुलाक़ात


 कभी खुद के संग वक़्त बिता कर तो देखो,

अपने अंदर छुपे अनकहे एहसास को, महसूस करके तो देखो।


दौड़-भाग की ज़िंदगी में,ख़्वाहिश जो अधूरी आज तक है,

खुद से बात कर उसे, मुकम्मल करने की राह बना कर तो देखो।


शोर अंदर भी है और बाहर भी,बाहर के शोर को कर दरकिनार,

अंदर के शोर को शांत करके तो देखो।


थोड़ा ठहरो… खुद को सुनो,  साँसों की सरगम में सुकून चुनो।

भीड़ में खोकर क्या पाया तुमने,एक पल खुद में लौटकर तो देखो।


थकान सिर्फ जिस्म की नहीं होती,रूह भी कभी-कभी सुकून माँगती है,

उसे लफ़्ज़ नहीं, बस  एक पल के लिए एहसास देकर तो देखो।


जिन  सवालों से भागते रहे हो,उन जवाबों को गले लगाकर तो देखो।

डर की दीवारें ऊँची सही,हौसलों से उन्हें गिराकर तो देखो।


अधूरी ख्वाहिशों की वो चिंगारी,आज भी दिल में सुलग रही है,

एक कदम बढ़ाकर,उसे शोला बनाकर तो देखो।


खामोशी में भी एक आवाज़ है,जो तुमसे ही तुम्हे मिलाती है,

 ठहर कर  ,उस आवाज़ को अपना हमसफ़र बनाकर तो देखो।

                                                                                                                                   DEEPSHREE 

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