व्यथा कीपैड के खाँचों की....
खाँचे कीपैड के हम कहलाते । दुनिया में अपनी ही नाचते -गाते ।। लैपटॉप की है, हम पर सरदारी। जिसे चलाना हमारी जिम्मेदारी ।। लिखना मिटाना हम सब कर सकते । आकार में चाहे छोटे ही हैं देखते। । छब्बीस मेरे रिश्तेदार है अंग्रेजी । एहमियत दिखाने को जो रहते सदा क्रेजी ।। विचारों भावों को हम दर्शाते। मन की व्यथा का चित्रण कर जाते ।। हैं थोड़े छोटे और हैं ,थोड़े नटखट । पर कर जाते हैं काम सभी हम झटपट ।। दो खाँचे गर संग मिल जाए। काम को मिनटों में ही निपटाएंँ ।। कभी रहते हैं मस्त कभी हो जाते हैं पस्त । कन्धों पर हमारे जिम्मेदारी का बोझ है जबरदस्त।। दोस्त हम सभी के बूढ़े जवान और बच्चों के। दोस्ती हम निभाते ज्ञान के संग मनोरंजन भी दे जाते ।। काम का बोझ कभी इतना है बढ़ जाता । कि बोझ के मारे कद हमारा बौना सा है रह जाता ।। पहचान हमारी इस्तेमाल से धुंधली है हो जाती । पर दृढ़ता से उंगलियाँ हम पर सटीक है बैठ जाती ।। ...