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लॉकडाउन एक ठहराव .......

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लॉकडाउन अपने में ही ज़िंदगी को समेट गया। इसने खुद को, खुद से मिलवाने का  परिवेश दिया ।    सुबह अब वैसी है, जैसी कि चाहत थी कभी । चिड़ियों का चहचहाना, ठंडी हवा की मदमस्त नमी। आकाश की शीतलता,पेड़ों की मंद-मंद हँसी। जानवर जो शांत, बेहाल थे,हम इन्सानों के शोर में, सुनती है अब आवाज़ उनकी हर कण-कण ,और हर छोर से । प्रकृति शायद अब कहना चाहे हमें, ठहरो और रुको। इस बेमानी भाग दौड़ में ख़ुद को न झोकों । इस ठहराव में रिश्तों  पर ज़मी धूळ ख़ुद ही गिरने और छटने लगी । अपने अनजाने कुछ यूँ हुए, की  ख़ुशियाँ ही टलने लगी।                                                                                                                            ...