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वो स्त्री है......

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                                                          एक  काम से लौटकर  वो  दूसरे काम पर लौट जाती है। एक काम से मिली दिन भर की थकान को दूसरे काम से हटा वो ,जाती है । एक काम में कुछ अलग रूप लिए   वो , दूसरे काम में खुद को तलाशती  रहती है । एक काम पर सभी को सजाती- संवारती  दूसरे काम में वो , खुद को खोजती रहती है। एक काम में  उचाईयों  पर  अपना मुकाम हासिल कर  दूसरे काम में धरा पर अपना अस्तित्व वो , खोजती रहती है। एक काम पर मिली मुस्कान को दूसरे काम पर जिम्मेदारी के बोझ तले दबा  वो ,  जाती है । एक काम पर झेले दर्द को दूसरे काम पर खुशियाँ  बाँट भूल सी  वो ,  जाती है । एक काम की दूसरे काम से तराजू पर नापतोल को सही बैठा वो ,जाती है । एक काम में महसूस किए उतार-चढ़ाव की दूसरे काम में झलक तक भी  वो , ना दिखलाती  है । एक काम के चौबीस  घंटो का दूसरे...