ऐ नींद
ऐ नींद ,कभी तू यूँ भी आ ..... कि तेरे आने की भी कोई आहट न हो। घबराहट न हो कोई दिल में, चिंता के निशान तक का भी कोई वजूद न हो। हो जाएँ गुम हवाएँ ,भी खामोशियों के सन्नाटे में, तेरे आने से सूखे पत्तों पर रखे पैरों से भी ,कोई सरसराहट न हो। वक़्त की न रहे परवाह, कर दे मुझे तू इतना बेफ़िक्र । दे ज़रा सुकून मुझे कुछ ऐसा ,दिल में कोई हडबड़ाहट न हो। सुन ले ऐ नींद ,दरख्वास्त एक मेरी जकड़ ले कभी तो मुझे इस कदर कि फिर किसी ख्वाब में भी, कोई रुकावट न हो। ...