हम और वो...
हम और वो शब्द आज, सोच को सोच में डाल गए । कहने को दो शब्द पर भाव को ,अधर में ही उलझा गए ।। हम ,कहता है साथ है एक दूजे का देने को तैयार। पर वो ,कहता है हम हमसे दूर खड़े हैं बना एक कतार ।। हम ने जोड़ी मैं ,आप और तुम की हर डोर । वो ,वो से जुड़ा घुलमिल भूला अपना ओर और छोर। हम , समेटे हुए हैं अपने में अपनेपन का भाव । वो , लगा है खोज में समेटे खुद में कुछ अभाव।। हम हैं इतना विस्तृत, लिए बैठा है खुद में कुछ ऐसा। वो ,टटोलता है उस विस्तार को अनजान बन पाने को कुछ हम के ही जैसा ।। हम , प्यार लगा विश्वास को है दर्शाता। वो ,कहते ही प्यार अपनापन कहीं दूर है शायद चला जाता। खुशियाँ बांटने का करो कभी फैसला तो हम को, अपनाओ। अकेला बैठा दूर कहीं वो ,उसे भी हम का ही हिस्सा तुम बनाओ। ...