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आईनों से भागते चेहरे...

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                                                                हर कोई खुश, बस अपने में ही है, जानता नहीं शायद सभी कुछ वो बारे में अपने, पर बखान उलझा सा ,दुनिया के सामने कर रहा  हर कोई है। कहते थे जो फ़र्क़ हमें पड़ता नहीं किसी की मुबारकबाद से, उसी मुबारकबाद की चाहत में बेसुध हो रहा  हर कोई है। तस्वीर अपनी हर मुकाम पर देखने की चाहत लिए बैठे हैं, पर उसी चाहत को दिल में बसाए हुए शख्स कि ,तस्वीर तक खींचने से बचता  हर कोई है। आईनों से अब नज़रें चुराने लगा है हर चेहरा, हक़ीक़त से भागकर ख्वाबों में ढूँढ रहा है सवेरा। भीड़ के शोर में भी एक सन्नाटा सा बसा है, अपने ही सवालों से ,घबरा रहा  हर कोई है। तालियों की  गूँज में सुकून ढूँढता फिर रहा है इंसान, पर दिल की ख़ामोशी का नहीं मिलता उसे कोई भी निशान। जो था असली, वही कहीं पीछे छूट गया है, नक़ाबों के इस दौर में खुद से ही छुपता  हर कोई है।   ...

नारी: उलझनों में भी उजाला

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                                   नारी आज की सुलझाती है सब कुछ , पर खुद में उलझ जाती है । सवालों के जवाब सभी के खोजकर लाने वाली , अक्सर, खुद से किए सवालों में उलझ जाती है। मुस्कुराने को जीने का अंदाज़ बताने वाली , तकिये में कभी-कभी मुँह दबाकर चुप-चुप रोती है। सपनों को सभी के   नए आयाम तक पहुँचाने वाली , अक्सर , अपनी उड़ान के पंखों को उलझी सी दिशा देती है। पहचान को अपने दम पर बनाने वाली , कभी-कभी अपने ही किसी कोने में अपनी अनकही पहचान खोजती है। सुकून के हर पल को परिभाषित करने वाली , अपने व्यक्तित्व की परिभाषा के लिए शब्द खोजती है। लिखा जो कुछ भी सच वो भी है , पर वो भी जो लिखने जा रही हूँ। नारी वो है.... जो अविश्वास को , विश्वास में बदलने की ताकत रखती है। वो है.... जो उड़ते पक्षी के अंदाज़ को देखकर , उसकी मंज़िल का पता लगा लेती है। वो है.... जो बार-बार हारकर भी , जीत की नई मिसाल बना देती है। वो है.... जो जीवन की हर मुश्किल को किस्मत के सहारे...

मुश्किल सब कुछ है, मुश्किल कुछ भी नहीं.....

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                                                                    मुश्किल सब कुछ है, मुश्किल कुछ भी नहीं ये सोच का फ़र्क़ है, और कुछ भी नहीं। जो डर को सच मान ले, वो रुक जाता है वहीं, जो ख़ुद पर यक़ीन कर ले—रास्ता बनाता है वही। रात जितनी भी काली हो, सुबह को रोक नहीं सकती, हार की हर कहानी, जीत को टोक नहीं सकती। घुटनों पर बैठा इंसान भी उड़ सकता है एक दिन, बस....... अपनी ही नज़रों में छोटा होना,छोड़ दे जो हर दिन । हर कदम पर सवाल, हर मोड़ पर इम्तिहान, मन कहता है थक गए, दिल कहता है—अभी कहाँ। जिसने मान ली हार ,उसके लिए सब मुश्किल, जिसने ठान ली जीत ,उसके लिए मुश्किल कुछ भी नहीं।                                  मुश्किल सब कुछ है, जब तू खुद को मान ले कमज़ोर, मुश्किल कुछ भी नहीं, जब दिल बोले—मैं हूँ ज़ोर। आज नहीं तो कल सही, पर जीत तुझे ही मिलेग...

चुभन

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                                                              सपनों को पूरा  न कर पाने का दर्द ,शायद बहुत दर्द देता होगा.. शायद कचोटता  होगा ,पल- पल साँस को मद्घम करता होगा...  आँखों और नींद का तालमेल शायद करता होगा बैचैन ।  अधूरे सपनों का दर्द, शायद छीन लेता होगा चैन ।।                                                                  बाजा़र में मिल ही जाती है ढूँढने पर, हर तकलीफ की दवा ।   सपनों के अधूरेपन के दर्द को ,शायद संवारे सिर्फ दुआ ।। ज़िंदगी में सब कुछ शायद हासिल किया जा सकता है । पर, दिल दिमाग में बुने ख़्वाब को अधूरेपन में कैसे डुबोया जा सकता है?  देखा  जिन्हें भी सपनों के अधूरेपन के दर्द से जुझते...

बेटी का अनकहा दर्द.......

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                                                                माँ मैं तुझे ,छोड़कर जाऊँ कैसे? दिल की धड़कन को मैं ,समझाऊँ कैसे? जिसे तू ,मेरा हाथ भरोसे से थमा रही है  उस पर ,तुझ जैसा यकीन महसूस कर जाऊँगी कैसे?  जैसे अपनी कोख और आँचल में रखा महफ़ूज़ तूने  उस यकीन की उम्मीद किसी अनजान से  ,कर पाऊँगी कैसे?   गरमाहट तूने ,अपनेपन की देकर सुकून से सम्भाला मुझे  नफरत और लालच की अग्नि से मैं खुद को बचाऊँगी  कैसे?  अपनी ज़िद को पापा और तुमसे, अपनी चादर के मुताबिक कहा मैंने.  किसी की लालच भरी इच्छा को, पापा और तुमसे  कह पाऊँगी कैसे ?  तुमनें कभी आवाज़ ऊँची कर डाँटा तक नहीं  मुझे  किसी कहने को अपने, की मार को मैं सह पाऊँगी कैसे?  छोटी -छोटी बात की शिकायत तुमसे करने वाली मैं  ज़िंदगी के खुद से रूठने की बात तुझे, बता पाऊँगी कैसे?  मुझे जलने से डर लगता है मा...

पिता 💖

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                                                                            पिता का किया कोई, तौल नहीं सकता| जो वो बेचता है उसका, मोल कोई लगा नहीं सकता||  कर दुनिया जताती है इक अंश, भर भी| जो वो करता है उससे वाकिफ़, वो खुद को भी नहीं कराता  ||   बेच वो खुद के सपने, सपने अपनों के सजाता है| पूरे होने पर उनके, बस दूर बैठा वो मुस्काता है || श्रेय उसे कोई खुल कर देता नहीं बात ये, बड़ी अनोखी है | माँ - माँ हर कोई करता , पिता को जपता कोई - कोई है || जो बिन जताए खुशियाँ दे वो, ईश कहलाए | पिता   भी तो वो ही करता तो, ईश से कम क्यूँ वो आँका  जाए?  गर हो उनकी छत्र- छाया में तो, मस्तक पर तेज महसूस करो  |  अच्छे कर्मो के लेप लगा , शीश  पिता  का  सुशोभित करो ||                 ...

मान सिंदूर का

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                                                             मान सिंदूर का हम रखते कितना, आज हमने बता डाला| शीश पर जो था सुशोभित उसके तेज ने ही, दुश्मन को हिला डाला || शांति के दूत भले हम जग में जाने जाते हैं | आन - बन पर लगे घात को हम, ना सहना  जानते हैं || छुट- पुट धमाके तो हम दिवाली पर ही हैं सुन लेते|  देश पर उठने वाली आँख को ,अपनी आँख से ही झुका देते || संयम को रख, बहुत दिनों तक बैठे थे हम दिल में अपने | गर्जन कर  सिंह की जैसी ,दौड़ा  डाला दुश्मन को बिल में || चूडी पहन जो, मान संस्कृति का अपनी रखना जानती है | वक्त़ आने पर दहाड़ से अपनी रूह कँपाना जानती है | उन चीखों को जिन्हें, देश ने पल- पल किया था महसूस | उन्हीं चीखों की आवाजों से न हो पाएगा दुश्मन महफ़ूज़ || चुप्पी है कमजोरी हमारी  दुश्मन ने  जब वहम  है ये, पाला |  तब -तब  क्रोध की आँधी में भस्म हमने, उसे कर डाला ||  थल, नभ और ज...