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Showing posts from June, 2020

सुई-धागा

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सुई-धागा ,एक ऐसा भी हो। जो कतरन नहीं ,ज़ख़मों को  सिल दे। जो कपड़े को नहीं, इंसान को  बना दे। जो जहाँ मुड़े ,वहाँ छाप छोड़े। जो  टूटे  हुए, एहसासों को जोड़े। जो जोड़े नए तार संग पुराने को। जो बतलाए एहमियत नए को ,पुराने की । जो चुभे ग़र ,तो आख़िर में ज़ख़मों की  मरम्मत कर दे। जो गुजरे एक छोर से तो दूसरे छोर को पहले से जोड़ दे। जो इंसान के रंग के मुताबिक़ ,उससे व्यवहार करे। जो जुड़ने की कसक को अधूरा न छोड़ दे। जो जोड़े इतना मज़बूत कि रिश्ता अटूट कर दे। जो कर पक्का हौंसला इंसान की तक़दीर ही बदल दे।                                                                   DEEPSHREE

सेना (हमारा गौरव)

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                                                 सेना बन एक ढाल, खड़ी है। जीवन-मृत्यु की मध्य कड़ी है ।। वीर पराक्रमी योद्धाओं की टोली। देश -प्रेम बन बैठा जिनकी बोली।। धारण किए विजय को पर ,मस्तक । देते सदा पराक्रम को दस्तक।। खड़े हैं छोड़ ,सब रिश्ते नाते। देश संग बस वे रिश्ता निभाते।। सोचे धर्म जात -पात से हटकर । देते शत्रु को नित दिन टक्कर ।। हुँक़ार ऐसी ,की धरती कांपे। शत्रु अगल-बगल में झाँके ।। भारत माँ की है सेना ,शान। इस पर अपना जीवन क़ुर्बान।।                                                                                                                         ...

गुनाह

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               गुनाह वो कर बैठी ,भरोसा करने का। इंसान समझेगा दर्द उसका ये विचार करने का। अपने में पनप रही नन्ही जान को सम्भाले। दर-दर वो भटक रही थी, बटोर उसके लिए निवाले। इंसान की क्रूरता ने फिर किया आघात। भाव तो दूर, किया इंसानियत पर प्रतिघात। टहल-टहल वो जंगल-जंगल, थी किसी के इन्तज़ार में। मानव का एक कृत्य कर गया, वार एक फल मात्र से। जो सक्षम थे,खडे रहे वो मान उसे एक घटना। खुद पर क्षण भर भी बीतती तो देते नाम दुर्घटना। वो भी माँ थी,सींच रही थी प्यार से अपने अंश को | निष्ठुर मानव के निर्दयी चरित्र ने मिटा दिया उसके वंश को। जैसी करनी वैसी भरनी चाहूँ अब हो जाए। दिया उसे इस दर्द को जिसने वो भी वैसा पाए ।                                                           DEEPSHREE

है वो बेजुबान पर, फिर भी समझता है...

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                                                       है वो बेजुबान है वो बेजुबान पर, फिर भी समझता है, आँखों की भाषा । शब्दों से अनजान होकर भी, सोच की परिभाषा ।। समझता है... कदम-कदम में छिपे मेरे भाव। महसूस जो करूँ वह, अनदेखा अभाव।। समझता है... आँखों की पुतलियों तक में छुपी खुशी को। अपना बन, न कह सकने वाली उन्हीं आँखों की नमी को। समझता है... चाहूँ मैं क्या, जो वह पल में ही करे। डर, प्यार भरा बस मेरा हो,बाकी दुनिया उससे डरे । समझता है... लाडला है वो, मेरे परिवार का। हकदार है वो,मेरे प्यार और दुलार का।। समझता है... मेरी बोली और भाषा के भाव में क्या गलत है, क्या सही? थोड़ी मनमर्जी कर अपनी करता जिसे मैं कहूँ, सही। समझता है... शहंशाह ,बन घूमता हर कोने में यहाँ-वहाँ । जहाँ इजाजत हमें ना मिलती, जा सकता है वो ही वहाँ । समझता है... कि कैसे उसकी इंतजार से भरी आँखें मुझे, मेरी अहमियत से मिलवाती हैं। उस मंजर क...

बात कलम से.....

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                                                 कलम उठाई , कुछ लिखने के लिए । मन में उठे बवंडर को ,शब्दों में पिरोने के लिए।। कलम बोली, मुझ से नहीं  मुँह से कह दे जज़्बात। उड़ेल दे मन के भावो को, शब्दों से करके बात ।। कहा कलम ने .... कहने से कह पाएगी,दिल का हाल। मिलेगा सुकून ,न रहेगी बेहाल।। कहा मैंने कलम से तू तो सुनती है ,समझती है। जो चाहूँ जैसा चाहूँ तू वैसे ही ,भावों को उड़ेलती है।। पर जिसे कहना है, वो दिमाग़ और दिल को मिलाता है। कभी अपना ,कभी पराया बन अपनी धुन में ही जीता जाता है।। तू , मेरी उँगलियों और शब्दों का तालमेल बैठाती है। पर, लिखना जिसके बारे में उसे सोच तो धड़कन ही रूक जाती है।। तू निर्जीव होकर भी , मेरा दर्द काग़ज़ पर उड़ेलती है। जीवंत है जो, उसकी सोच भी न मुझ पर रुकती है।।  तुझमें और उसमें ,शायद एक ही बात समान है। तू भी है बहुत रंगों की, वो भी अनेक रूपों की दुकान है।।                   ...