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तब आती है ,घर की याद....

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                                                                                                               जब कोई गम का साया, सताता है । संघर्षों के तूफानों से, जब मन  घबराता है  । उजालों का साया जब, गम के अंधेरे में चेहरा छिपाता है , तब आती है, घर की याद ।। मन की स्थिति हो जाती है जब ,विकराल । दुख का पंछी ,जब डोलता है डाल डाल । जब नहीं रहता जीवन का कोई रखवाल तब आती है, घर की याद ।। जब हर सदस्य में ,भरा रहता है अहम । तिरस्कृत होने के पश्चात भी, रहता है वहम । देख दूसरों के मानस पटल को, जाती हूँ मैं सहम, तब आती है, घर की याद।। जब मिलती है ,हर सदस्य से उपेक्षा । घायल होती है ,मन की सारी अपेक्षा । दब जाती है बलवती होती सारी इच्छा, तब आती है, घर की याद ।। छूटा हुआ, बाबुल का आँगन बहुत याद आता है । दोस्तो...