मान सिंदूर का
मान सिंदूर का हम रखते कितना, आज हमने बता डाला| शीश पर जो था सुशोभित उसके तेज ने ही, दुश्मन को हिला डाला || शांति के दूत भले हम जग में जाने जाते हैं | आन - बन पर लगे घात को हम, ना सहना जानते हैं || छुट- पुट धमाके तो हम दिवाली पर ही हैं सुन लेते| देश पर उठने वाली आँख को ,अपनी आँख से ही झुका देते || संयम को रख, बहुत दिनों तक बैठे थे हम दिल में अपने | गर्जन कर सिंह की जैसी ,दौड़ा डाला दुश्मन को बिल में || चूडी पहन जो, मान संस्कृति का अपनी रखना जानती है | वक्त़ आने पर दहाड़ से अपनी रूह कँपाना जानती है | उन चीखों को जिन्हें, देश ने पल- पल किया था महसूस | उन्हीं चीखों की आवाजों से न हो पाएगा दुश्मन महफ़ूज़ || चुप्पी है कमजोरी हमारी दुश्मन ने जब वहम है ये, पाला | तब -तब क्रोध की आँधी में भस्म हमने, उसे कर डाला || थल, नभ और ज...