क्या कभी ?
क्या कभी सपनों को टूटने का दर्द झेला है? क्या कभी अनकहे, अनसुलझे सवालों का धक्का झेला है? क्या कभी मन में दबे ज़ज्बात का बोझ झेला है? क्या कभी ख्वाहिशों को पूरा कर न सकने का बोझ झेला है? क्या कभी मंजिल को बीच राह में छोड़ देने का दुख झेला है? क्या कभी लोगों का तुम्हारे सपनों पर हसने का अंधकार झेला है? अगर नही.... तो या तो सपना सच नहीं है | या सपना अभी दिल दिमाग में उतरा नहीं है | अगर हाँ... तो राह तुम्हारी मंजिल को पाएगी | और दुनिया इक दिन तुम्हारी जैसी, मंजिल को पाना चाहेगी | ...