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छलिया है ,वक़्त

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                                          कभी -कभी विचार मन में मेरे ,कुछ ऐसा आता है... क्या बदलते वक़्त के साथ हर इंसान भी बदल जाता है? दुख दर्द, खुशियों को पल -पल बांटते  थे कभी.... क्या बदलते वक़्त के बदलाव में उनका, एहसास भी बदल जाता है?  शायद कभी- कभी किसी को कुछ इतना ही अपना मान लेते हैं हम  कि  वक़्त बदलने पर वक़्त के जैसा वो भी, पराया  सा  बना जाता है | सब अपने हैं अपने संग ही हैं विचार ये, मन को सुकून तो देता है  पर  वक़्त बताता है, की वक़्त ही आख़िर में संगी-साथी रह जाता है | आज खुद के लिए, खुद पर खर्च कर लो वक़्त सारा  क्यूँकी  वक़्त छलिया है कुछ ऐसा, जो न आज है तुम्हारा, न  कल रहेगा तुम्हारा...                                                                 ...

यहाँ बात उसकी ही हो रही है जो.....

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                                                               मान, सम्मान से मिलवाने वाला अपना मान ढूँढता है | पल- पल निखारने में लगा वो, अपनी रौनक खोजता है || समझौता वो कर रहा अपने आत्मसम्मान से  पर फिर भी.......  हर कोई उसमें ही कमी खोजता है|| अनैतिक उम्मीदों के टोकरे का बोझ वो बेमन से उठाता है | मन, मस्तिष्क में दर्द लिए वो देख सभी को मुस्काता  है |  रोटी - पानी, परिवार को दरकिनार खुद को कर रहा वो साबित पर फिर भी.......  शाम ढ़लने पर ,वो खुद को भी कुछ ढलका हुआ सा ही पता है | उसकी सोच के पंखों को बाँध,  उससे हर कोई उड़ान की उम्मीद जताता है | सोचते नहीं उम्मीद रखने वाले कि, बंधे पंखों से क्या कोई उड़ पाता है?  वो लगा है खुद के आत्मसम्मान को बचाने की उधेड़बुन में  पर फिर  भी ..... जीवन  को आत्म-सम्मान संग जीने का पाठ पढ़ाता है | जो आता है, उसे अपनी मनमर्जी का बोल कर चला जाता...