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नारी: उलझनों में भी उजाला

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                                   नारी आज की सुलझाती है सब कुछ , पर खुद में उलझ जाती है । सवालों के जवाब सभी के खोजकर लाने वाली , अक्सर, खुद से किए सवालों में उलझ जाती है। मुस्कुराने को जीने का अंदाज़ बताने वाली , तकिये में कभी-कभी मुँह दबाकर चुप-चुप रोती है। सपनों को सभी के   नए आयाम तक पहुँचाने वाली , अक्सर , अपनी उड़ान के पंखों को उलझी सी दिशा देती है। पहचान को अपने दम पर बनाने वाली , कभी-कभी अपने ही किसी कोने में अपनी अनकही पहचान खोजती है। सुकून के हर पल को परिभाषित करने वाली , अपने व्यक्तित्व की परिभाषा के लिए शब्द खोजती है। लिखा जो कुछ भी सच वो भी है , पर वो भी जो लिखने जा रही हूँ। नारी वो है.... जो अविश्वास को , विश्वास में बदलने की ताकत रखती है। वो है.... जो उड़ते पक्षी के अंदाज़ को देखकर , उसकी मंज़िल का पता लगा लेती है। वो है.... जो बार-बार हारकर भी , जीत की नई मिसाल बना देती है। वो है.... जो जीवन की हर मुश्किल को किस्मत के सहारे...