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इन्तज़ार

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                                                            इन्तज़ार हर पल पर अपनी अनचाही रोक, सी लगा जाता है। हर साँस को थमा सा जाता है । सोच को ठहराव से मिलवा जाता है । बोल सकने वाली आँखों को ,पत्थर सा बना जाता है | सही गलत में द्वंद का करा जाता है । असहाय सा दर्द दिल को दे जाता है । छुपे भाव को बेपर्दा सा कर जाता है । दिमाग में सरसराहट, दिल में घबराहट सी भर जाता है। कहता है कुछ पर, समझा कुछ और ही जाता है। सब्र रखने वालों को बेसब्र सा  बना जाता है। कभी मिलवा जाता है ,अनचाही खुशी और गम से भी । दे जाता है ठहराव कभी-कभी जिंदगी को भी।                                                                                         ...

कोख

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                                                                            बच्ची ,कोख में घूम यह सोचे.. क्या ,दुनिया बाहर भी अंदर जैसी ही है? क्या ,वहाँ  माँ की कोख जैसी ममता की गर्माहट है? क्या ,मेरी माँ की आवाज़ की बाहर की आहट है? क्या ,बाहर की दुनिया भी मेरी माँ के इर्द-गिर्द ही घूमेगी? क्या ,बाहर की दुनिया में भी माँ  मुझे हर पल छू लेगी? क्या ,रहूँगी मैं जुड़ी माँ से तब भी एक नाल से? क्या, एहसास माँ की ममता का करूँगी महसूस उसी एहसास से? क्या, माँ के खाए का स्वाद बाहर की दुनिया में भी मिलेगा? क्या, बाहरी दुनिया में भी मेरा तन-मन प्रसन्न हर पल रहेगा? क्या, होगी आजादी मुझे भी घूमने की माँ की कोख जैसी? क्या ,बाहर भी होगी दुनिया पंख फैला नभ में उड़ने जैसी? सवाल मन में उठे मुझे सोचने को करते हैं मजबूर। क्योंकि नहीं होना चाहती मैं, अपनी माँ से एक पल भी दूर।। कोख के अंदर और बाहर दुनिया में है ग...