दायरा....
दायरा कभी-कभी वो बता जाते हैं। जो दायरे से परे जिंदगी का हिस्सा बन जाते हैं। बदलाव को अपने में आए बदलाव से बदलते हैं। पर उसी बदलाव को दायरे में ढक वजूद को तोड़ते हैं। दायरे से दायरा रख पल-पल संग चलने वाले । दायरे की वैसाखी से अपने गुनाहों को ढकते हैं । दायरे की चक्की में बाट दो ही होते हैं । उसमें डाले भाव दोनों बाटो में एक समान पीसते हैं।। दायरा समझाने वाले ये जानते नहीं शायद ..... हर शब्द का अर्थ भाव सभी के लिए समान होता है। अभाव का पता नहीं आज इधर तो कल कहाँ रुकता है । .... ...