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Showing posts from August, 2020

हाथ की लकीरें......

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लकीरें चलाती हैं, इन्सान को। जगाती,सुलाती हैं,इन्सान में बसे भगवान को।। दिशा को भी दिशा से  भटकाती  हैं लकीरें । बुद्धि से चुनी,दिशा को भी गलत दिखला जाती हैं लकीरें ।। लकीरें वो हैं जो पल-पल संग-साथ दिखती हैं। पर एक शायद वो ही हैं,जो शायद न पल भर हमारे संग ही टिकती है।। लकीरों का फेर रब के बिना कोई ना जाने। चाहे बुनता रहे दिल -रात मन,सपना के ताने-बाने । । उम्मीदों का जोड़-तोड़ टीका इन लकीरों में। भिखारी को राजा, राजा को भिखारी बनाया इन्ही लकीरों ने।। सुख और दुःख के  दरमियाँ   लकीर खींचती हैं, लकीरें । अपना ही सुना फैसला,हमें निर्बल कर जाती हैं लकीरें ।। इक अन्जाना सा कभी-कभी दर्द दे जाती हैं लकीरें । दर्द के इलाज को भी लकीर से जोड़ जाती हैं लकीरें।। सोचती हूँ कभी-कभी थम एक पल को मैं .... गर, लकीरों का फेर नहीं ज़िंदगी तो दिल से की कोशिश को अंजाम तक क्यूँ पहुँचाती नहीं लकीरें? दिन -रात की गई शीद्दत को इन्सान से मिलवाती क्यूँ नहीं लकीरें?? कुछ  न  करने वालों की झोली सुख से कैसे भर जाती हैं लकीरें? अपने को मिटा,दूजे का साथ क्यूँ निभाती हैं ये धोखेबाज लकी...

मेरी नन्ही गुड़िया

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  बिस्तर पर रखी एक गुड़िया , प्यार भरी यादों की है पुड़िया ।। बैठी वह बन दोस्त मेरी । सुनती समझती हर बात वह मेरी ।। शांत है ,मौन है करती दुखों को पस्त। दुनियादारी की फिक्र नहीं, अपनी ही दुनिया में है मस्त।। सीखा उससे हर पल मुस्काना । हर कठिनाइयों का करना सामना ।। जिस दिशा  बिठाओ , बैठी वो  रहती । शायद हर पल यादों को  वो   है कुरेदती ।। आई वो किसी खास से मिलकर । किसी खास के पैगाम को अपने संग लेकर ।। खास वो पल था ,जो वो आ मिली मुझसे । शायद यादों को दूर जाने देना नहीं चाहती है वो मुझसे।। एक दिन बोली मेरी गुड़िया, है मन में एक सवाल। मैनें सोचा,ना जाने ये  क्या पूछ करेगी धमाल।। बोली वो................ मैं बन निर्जीव जीवन को दिशा दिखाती  हूँ। हर हाल,हर पल में  जीवन को जीए जाती हूँ।। बिन प्राणों के भी  मेरी गुड़िया जीवन को दिशा दिखाए। प्राणवायु को किए संचित खुद में मानव, जीवन जीने में सकुचाए ।। मुस्काती  हर पल, जब से अस्तित्व में है आई । शायद है वो बेजुबान ,इसलिए नहीं चखी  उसने दुख की परछाई।। यही सबक मेरी नन्ही गुड़िया का । जीवन को मुस्क...

क्या उम्र है पैमाना प्यार का?

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क्या उम्र है पैमाना प्यार का? खुद को भूल इक खास को जानने का? क्या  उम्र के मुताबिक  दिल चलता है? क्या देख वो किसी ,को सोच कर कुछ करता  है? गर यूँ  होता दिल तो उम्र को देख मुरझा  जाता। उम्र की सीढ़ी तय  कर बूढ़ा हो वो भी शायद मर ही जाता। पर.......... एक दिल ही नियामत बक्शी है खुदा ने । जिसने  अपने में समेटे  सुनहरे पल,खुबसूरत  अफ्साने।। तोले जो प्यार को उम्र के तराज़ू  में । खोखला वही रह जाएगा,उम्र को एहमियत देने में ।। दिल की अच्छाई ही  खिंचाव का कारण बनती है। पर, ज़्यादा अच्छा दिल रखने से अन्त में आत्मा तक तडपती है।। उम्र को कारण बना,दिल की करने वाले बेकदरी । होंगे शायद  अच्छे,पर दिल से  शायद हैं बेदर्दी ।। तलाश  में प्यार के,उम्र को एहमियत  जो दे बैठे। वक़्त यकीनन उन्हे चेताएगा,की जान-बुझ गुनाह वो क्या कर बैठे?                                                           ...

कैसे कर पाओगे/आखिर कैसे?

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खो दिया एक बार तो फिर उसे, कैसे फ़िर  पाओगे? पा भी गए अगर तो, उससे कैसे निभाओगे? निभाने के लिए हौसला फिर कहाँ से लाओगे ? हौसले को इतना बुलंद कैसे बनाओगे? बुलंदियों पर चढ़े उस रिश्ते को ज़हन में  फिर  कैसे बसाओगे? चैन  के उस पल को फिर कैसे जिए जाओगे ? इंसान ही बदल गया तो उसे बदले हुए इंसान को कैसे पा पाओगे? दिल के उसी कोने में उसे, कैसे  सँजो पाओगे? कर गया जो खाली जगह, उसे कैसे भर पाओगे ? उम्मीदों के सैलाब को फिर कैसे रोक पाओगे ? भरोसा कर भी लो तो इस, कशमकश से बाहर कैसे आओगे? बीच में बनी दायरो की दीवारों को तुम  कैसे   गिरा पाओगे? लकीरें जो कभी एक थी हो गई उन्हे ,अलग  कैसे कर पाओगे ? खुशियाँ बटोरी दिल के जिस कोने में, टूटे हुए उस दिल को कैसे संभाल पाओगे? खुशियाँ  जो सँजो -सँजो  कर बटोरी थी कभी टूटा उन्हें तुम, कैसे देख पाओगे? कह पाए जिस बात को  बेझिझक कभी तुम, आज क्या उस बात को झिझक के साथ भी  तुम    कह   पाओगे?                            ...