हाथ की लकीरें......
लकीरें चलाती हैं, इन्सान को। जगाती,सुलाती हैं,इन्सान में बसे भगवान को।। दिशा को भी दिशा से भटकाती हैं लकीरें । बुद्धि से चुनी,दिशा को भी गलत दिखला जाती हैं लकीरें ।। लकीरें वो हैं जो पल-पल संग-साथ दिखती हैं। पर एक शायद वो ही हैं,जो शायद न पल भर हमारे संग ही टिकती है।। लकीरों का फेर रब के बिना कोई ना जाने। चाहे बुनता रहे दिल -रात मन,सपना के ताने-बाने । । उम्मीदों का जोड़-तोड़ टीका इन लकीरों में। भिखारी को राजा, राजा को भिखारी बनाया इन्ही लकीरों ने।। सुख और दुःख के दरमियाँ लकीर खींचती हैं, लकीरें । अपना ही सुना फैसला,हमें निर्बल कर जाती हैं लकीरें ।। इक अन्जाना सा कभी-कभी दर्द दे जाती हैं लकीरें । दर्द के इलाज को भी लकीर से जोड़ जाती हैं लकीरें।। सोचती हूँ कभी-कभी थम एक पल को मैं .... गर, लकीरों का फेर नहीं ज़िंदगी तो दिल से की कोशिश को अंजाम तक क्यूँ पहुँचाती नहीं लकीरें? दिन -रात की गई शीद्दत को इन्सान से मिलवाती क्यूँ नहीं लकीरें?? कुछ न करने वालों की झोली सुख से कैसे भर जाती हैं लकीरें? अपने को मिटा,दूजे का साथ क्यूँ निभाती हैं ये धोखेबाज लकी...