आईनों से भागते चेहरे...
हर कोई खुश, बस अपने में ही है,
जानता नहीं शायद सभी कुछ वो बारे में अपने,
पर बखान उलझा सा ,दुनिया के सामने कर रहा हर कोई है।
कहते थे जो फ़र्क़ हमें पड़ता नहीं किसी की मुबारकबाद से,
उसी मुबारकबाद की चाहत में बेसुध हो रहा हर कोई है।
तस्वीर अपनी हर मुकाम पर देखने की चाहत लिए बैठे हैं,
पर उसी चाहत को दिल में बसाए हुए शख्स कि ,तस्वीर तक खींचने से बचता हर कोई है।
आईनों से अब नज़रें चुराने लगा है हर चेहरा,
हक़ीक़त से भागकर ख्वाबों में ढूँढ रहा है सवेरा।
भीड़ के शोर में भी एक सन्नाटा सा बसा है,
अपने ही सवालों से ,घबरा रहा हर कोई है।
तालियों की गूँज में सुकून ढूँढता फिर रहा है इंसान,
पर दिल की ख़ामोशी का नहीं मिलता उसे कोई भी निशान।
जो था असली, वही कहीं पीछे छूट गया है,
नक़ाबों के इस दौर में खुद से ही छुपता हर कोई है।
DEEPSHREE

Bhut khoob ...
ReplyDeleteShukriya
Deleteबहुत गूढ़ रहस्य है इस कविता में.... अति सुंदर
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