बेटी का अनकहा दर्द.......

                                                               

माँ मैं तुझे ,छोड़कर जाऊँ कैसे?

दिल की धड़कन को मैं ,समझाऊँ कैसे?

जिसे तू ,मेरा हाथ भरोसे से थमा रही है 

उस पर ,तुझ जैसा यकीन महसूस कर जाऊँगी कैसे? 

जैसे अपनी कोख और आँचल में रखा महफ़ूज़ तूने 

उस यकीन की उम्मीद किसी अनजान से  ,कर पाऊँगी कैसे? 

 गरमाहट तूने ,अपनेपन की देकर सुकून से सम्भाला मुझे 

नफरत और लालच की अग्नि से मैं खुद को बचाऊँगी  कैसे? 

अपनी ज़िद को पापा और तुमसे, अपनी चादर के मुताबिक कहा मैंने.

 किसी की लालच भरी इच्छा को, पापा और तुमसे  कह पाऊँगी कैसे ? 

तुमनें कभी आवाज़ ऊँची कर डाँटा तक नहीं  मुझे 

किसी कहने को अपने, की मार को मैं सह पाऊँगी कैसे? 

छोटी -छोटी बात की शिकायत तुमसे करने वाली मैं 

ज़िंदगी के खुद से रूठने की बात तुझे, बता पाऊँगी कैसे? 


मुझे जलने से डर लगता है माँ 

जानकर यह भी पास तेरे रह पाऊँगी  कैसे? 


माँ, मुझे हर हाल में तू अपना लेना 

गर जिन्दा लौटूँ या कफ़न में लिपटी मैं 



                                                                                                                              DEEPSHREE

Comments

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    1. शुक्रिया ✨

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  2. Bahut sundar abhivyakti
    Ek ek shabd ko moti ki tarah Piro diya hai.

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    1. प्रयास किया, दर्द को बयाँ करने का, जिसे आज भी समाज मान्यता दिए बैठा है...
      शुक्रिया 🙏

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  3. अदभुत अभिव्यक्ति, हर मां पिता पढ़े इसे ,उन तक पहुंचे।

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    1. शुक्रिया 🙏

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  4. बहुत खूबसूरत प्रस्तुति मैम

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