मान सिंदूर का
मान सिंदूर का हम रखते कितना, आज हमने बता डाला|
शीश पर जो था सुशोभित उसके तेज ने ही, दुश्मन को हिला डाला ||
शांति के दूत भले हम जग में जाने जाते हैं |
आन - बन पर लगे घात को हम, ना सहना जानते हैं ||
छुट- पुट धमाके तो हम दिवाली पर ही हैं सुन लेते|
देश पर उठने वाली आँख को ,अपनी आँख से ही झुका देते ||
संयम को रख, बहुत दिनों तक बैठे थे हम दिल में अपने |
गर्जन कर सिंह की जैसी ,दौड़ा डाला दुश्मन को बिल में ||
चूडी पहन जो, मान संस्कृति का अपनी रखना जानती है |
वक्त़ आने पर दहाड़ से अपनी रूह कँपाना जानती है |
उन चीखों को जिन्हें, देश ने पल- पल किया था महसूस |
उन्हीं चीखों की आवाजों से न हो पाएगा दुश्मन महफ़ूज़ ||
चुप्पी है कमजोरी हमारी दुश्मन ने जब वहम है ये, पाला |
तब -तब क्रोध की आँधी में भस्म हमने, उसे कर डाला ||
थल, नभ और जल सेना की गर्जन को अब दुश्मन झेलेगा |
हिन्द की हुंकार सह, नक्शे में खुद को अब वो खोजेगा ||
DEEPSHREE

Beautiful ❤️
ReplyDeleteEk ek shabd moti ki tarah mala mai Piro diye hai bahut sundar
ReplyDeleteDeep thoughts ,very beautifully expressed
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