अनोखा द्वन्द 🌟
आँख सोना चाहती थी पर, दिमाग ने सोने न दिया |
दिल घिर गया सवालों में सुकून से दिमाग को टिकने न दिया|
उठक - पटक का एक दौर रात भर मैंनें किया महसूस |
न दिल लगा न दिमाग, सब्र इक पल भी मुझे न हुआ महसूस |
कभी दिल हौसला देता दिमाग को, कभी दिमाग देता दिल को |
बेपरवाह से दोनों इक - इक कर मना रहे थे एक दूजे को ||
दिल के अपने तर्क - वितर्क और थी अपनी इक दलील अनोखी |
दिमाग अपनी कीमत बता कर तस्वीर उकेर रहा था अनोखी ||
सवाल आसान था जिस पर द्वंद दोनों में था छिड़ा |
जवाब के इंतजार में आखों का फाटक नींद से जा भिड़ा||
आखिरकार वो आई, मीठा सा एक एहसास लिए..
सुला गई वो मेरे सपनों को,प्यारी भरी अपनी गोद में लिए..
DEEPSHREE

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