छलिया है ,वक़्त

 

                                       


कभी -कभी विचार मन में मेरे ,कुछ ऐसा आता है...

क्या बदलते वक़्त के साथ हर इंसान भी बदल जाता है?


दुख दर्द, खुशियों को पल -पल बांटते  थे कभी....

क्या बदलते वक़्त के बदलाव में उनका, एहसास भी बदल जाता है?


 शायद कभी- कभी किसी को कुछ इतना ही अपना मान लेते हैं हम 

कि

 वक़्त बदलने पर वक़्त के जैसा वो भी, पराया  सा  बना जाता है |


सब अपने हैं अपने संग ही हैं विचार ये, मन को सुकून तो देता है 

पर 

वक़्त बताता है, की वक़्त ही आख़िर में संगी-साथी रह जाता है |


आज खुद के लिए, खुद पर खर्च कर लो वक़्त सारा 

क्यूँकी 

वक़्त छलिया है कुछ ऐसा, जो न आज है तुम्हारा, न  कल रहेगा तुम्हारा...

                                                                                                                                        DEEPSHREE

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