तब आती है ,घर की याद....

                                              

                                                               



जब कोई गम का साया, सताता है

संघर्षों के तूफानों से, जब मन  घबराता है 

उजालों का साया जब, गम के अंधेरे में चेहरा छिपाता है ,

तब आती है, घर की याद ।।



मन की स्थिति हो जाती है जब ,विकराल

दुख का पंछी ,जब डोलता है डाल डाल

जब नहीं रहता जीवन का कोई रखवाल

तब आती है, घर की याद ।।



जब हर सदस्य में ,भरा रहता है अहम

तिरस्कृत होने के पश्चात भी, रहता है वहम

देख दूसरों के मानस पटल को, जाती हूँ मैं सहम,

तब आती है, घर की याद।।



जब मिलती है ,हर सदस्य से उपेक्षा

घायल होती है ,मन की सारी अपेक्षा

दब जाती है बलवती होती सारी इच्छा,

तब आती है, घर की याद ।।



छूटा हुआ, बाबुल का आँगन बहुत याद आता है

दोस्तों के साथ बिताया बचपन, मन को लुभाता है

यादों की जंजीरों में अपनों को जकड़ा हुआ ,जब मन पाता है,

तब आती है, घर की याद।।

                                                                                                                                        DEEPSHREE

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