मुझे,झूठ को सच लिखना नहीं आता.......

                                                            

 मुझे,झूठ को सच लिखना नहीं आता।

अमिट हूँ मुझे, मिटना नहीं आता,

स्वाभिमान, मान, सम्मान रत्न है अनमोल मेरे लिए 

बिन गलती के मुझे ,झुकना नहीं आता।

हाँ मुझे, झूठ को सच लिखना नहीं आता। 


माना कि सरताज का फूल नहीं हूँ,

मैं ,किसी के चरणों की धूल नहीं हूँ,

यूँ तो मैं महक उठती हूँ थोड़ी  सी खुशी में,

पर किसी के गम में मुझे ,हँसना नहीं आता।

हाँ मुझे, झूठ को सच लिखना नहीं आता। 


कुछ दिन भूखा रह कर जी सकती हूँ।

पानी न हो तो ,अश्रुकण पी सकती हूँ।

मछली बन मुझे. ख्वाइशों के लिए तड़फना नहीं आता,

किसी और का हक मुझे ,हड़पना नहीं आता।

हाँ मुझे. झूठ को सच लिखना नहीं आता। 


खड़ी हूँ मैं, नेकी के पावन पथ पर,

झूठ के पर्वत पर टिकना नहीं आता,

डूबना मंजूर है विश्वास  के दरिया में,

धोखे की सतह पर मुझे, तैरना नहीं आता।

हाँ मुझे .झूठ को सच लिखना नहीं आता।

                                                                                                                                             DEEPSHREE   

Comments

  1. 👏👏👏👏👏

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  2. Jhooth ke age jhukna bhi kyu hai.... Very well written

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  3. सार्थक अभिव्यक्ति👏👏👏

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  4. Awesome !

    Regards,
    Dr Naveen

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  5. बेहतरीन है दीप्ति Ma'am👍

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