सन्नाटा (कोरोना की मौजूदगी से महसूस किए अनचाहे बदलाव)

                                                             



सन्नाटा शोर में भी किया, पल के भी हर पल में महसूस।

 एहसास ,कचोट कर बैठ गया खुद को मान दिल में मेरे महफूज़ ।।


भाव से भरा चेहरा भी अनकहा सा ,किया महसूस ।
पर, दिल के कोने में एक खौफ को रख बैठे  महफूज़  ।।

छूकर गले मिलकर कहना चाहते थे कहाँ थे आप?
आँखों की अनकही भाषा में जानना चाहते थे कैसे हैं आप ?

पर
अनकहे डर ने लगा दी रोक एहसास को कर दिया मायूस ।।

थी कलम हाथ में पर ना ,कर देने को हुए हम मजबूर।
थे संग खड़े पर दूर होने के  एहसास से न खुद को कर पाए हम
महफूज़  ।

भाषा का ज्ञान रखते हैं पर, एहसास संग अपने रखने को हुए मजबूर।
दिल दिमाग में हुई उथल पुथल जो कर न कर पाई आँखों की भाषा को 
 महफूज़ ।।

मन में उठा ज्वार ,पूछने को कुछ सवाल हुआ मन मजबूर ।
कहाँ से आया एक अनदेखा अदृश्य सा करने हमें घर में ही महफूज़।।

कष्ट कितना भी विकराल हो विश्वास को नहीं कर सकेगा मेरे मजबूर ।
चारदीवारी में रहना भी पढ़े गम नहीं चाहत है रहूँ अपनों के दिलों  में   महफूज़  ।

                                                                                                                                 DEEPSHREE

Comments

Post a Comment

भाव के अनुरूप पढ़कर प्रोत्साहित करें l

Popular posts from this blog

नारी: उलझनों में भी उजाला

बेटी का अनकहा दर्द.......

चुभन