कोख
बच्ची ,कोख में घूम यह सोचे..
क्या ,दुनिया बाहर भी अंदर जैसी ही है?क्या ,वहाँ माँ की कोख जैसी ममता की गर्माहट है?
क्या ,मेरी माँ की आवाज़ की बाहर की आहट है?
क्या ,बाहर की दुनिया भी मेरी माँ के इर्द-गिर्द ही घूमेगी?
क्या ,बाहर की दुनिया में भी माँ मुझे हर पल छू लेगी?
क्या ,रहूँगी मैं जुड़ी माँ से तब भी एक नाल से?
क्या, एहसास माँ की ममता का करूँगी महसूस उसी एहसास से?
क्या, माँ के खाए का स्वाद बाहर की दुनिया में भी मिलेगा?
क्या, बाहरी दुनिया में भी मेरा तन-मन प्रसन्न हर पल रहेगा?
क्या, होगी आजादी मुझे भी घूमने की माँ की कोख जैसी?
क्या ,बाहर भी होगी दुनिया पंख फैला नभ में उड़ने जैसी?
सवाल मन में उठे मुझे सोचने को करते हैं मजबूर।
क्योंकि नहीं होना चाहती मैं, अपनी माँ से एक पल भी दूर।।
कोख के अंदर और बाहर दुनिया में है गर, कुछ भी अंतर।
ख्वाहिश है मेरी ,करूँ विचरण हरदम माँ की ही कोख के अंदर।।

Fantabulous 👏👏👏👏👏👏
ReplyDeleteThanks Priti🌺
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ReplyDeleteAwesome 👍
ReplyDeleteThanks 🌺
DeleteFantabulous. I m yr big fan❤️❤️❤️
ReplyDeleteThanks for ur appreciation 🌺
DeleteWow too good Dear Have no words to express its just wow
ReplyDeleteUr appreciation matters.. Thanks alot for ur appreciation 🌺👍🏼
DeleteAmazing 👏👏👏👏👏👏
ReplyDeleteBeautiful
ReplyDeleteThanks mam🌺
DeleteUttam...feelings beautifully expressed
ReplyDeleteDhanyawad..🌺🙏
DeleteYour words are so relatable to today's scenario. Beautiful
ReplyDeleteThanks for ur appreciation 🌺🙏
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