दर्द की गूँज

                                         

 नन्ही सी परी थी वो।

नाज़ों से पाली गई थी वो।।

वो थी माँ -बाप का मान सम्मान।
थी वो ,अपने भाई का अभिमान।।
दुख को जिसने कभी ना किया महसूस ।
आज बैठी अपने आप को समेटे हुए मायूस।।
आँगन जिसकी बोली से चहकता था जहाँ |
दर्द की गूँज रही चीखें ,अब वहाँ ।|
ना गलती उसकी,ना कोई उसका कुसूर।।
फिर भी होता पल-पल अस्तित्व उसका चकनाचूर ।
नजरों को गर्व से मिलाती थी वह सबसे।|
बेवजह उन्हीं नजरों को छुपाती है वो सभी से।
दर्द के निशान जो उसके ज़हन पर छपते हैं।।
नासूर बन, पल-पल उसकी आत्मा को डसते हैं।
किसी की काली सोच को वह भुगतती है ।।
पड़े जिस्म पर धब्बों को हटाने को ,कुरेददी है |
खुद से करती नफरत, प्यार खुद से करने वाली।।
खो जाती अंधेरों में रोशनी को भी दिशा दिखाने वाले वाली||
शक्ति में वो कम नहीं, भंडार है उसमे धैर्य  का।
ठान ले गर सोच में कुछ तो उसे, कर गुज़रने का।।
पर भूलो  नहीं कि ......

मान  को उसके जब ठेस पहुँचती है।
फूल सी सौम्य दिखने वाली ,बिजली बन गरजती है।
                                                                                                              DEEPSHREE

Comments

  1. 👏👏👏👏👏👏👏

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    1. बिल्कुल सही,ऐसा दर्द जो कोई बाँट नहीं सकता।😌

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  3. वाह जी वाह. ह्रदय ग्राही रचना. 👌♥️

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    1. प्रोत्साहन के लिए शुक्रिया ❤❤❤❤

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  4. A soul touching composition. Well done

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  5. Replies
    1. Undoubtedly as it's a reflection of someone's pain..😌

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