हाथ की लकीरें......




लकीरें चलाती हैं, इन्सान को।

जगाती,सुलाती हैं,इन्सान में बसे भगवान को।।
दिशा को भी दिशा से  भटकाती  हैं लकीरें ।
बुद्धि से चुनी,दिशा को भी गलत दिखला जाती हैं लकीरें ।।
लकीरें वो हैं जो पल-पल संग-साथ दिखती हैं।
पर एक शायद वो ही हैं,जो शायद न पल भर हमारे संग ही टिकती है।।
लकीरों का फेर रब के बिना कोई ना जाने।
चाहे बुनता रहे दिल -रात मन,सपना के ताने-बाने ।


उम्मीदों का जोड़-तोड़ टीका इन लकीरों में।
भिखारी को राजा, राजा को भिखारी बनाया इन्ही लकीरों ने।।
सुख और दुःख के दरमियाँ  लकीर खींचती हैं, लकीरें ।
अपना ही सुना फैसला,हमें निर्बल कर जाती हैं लकीरें ।।
इक अन्जाना सा कभी-कभी दर्द दे जाती हैं लकीरें ।
दर्द के इलाज को भी लकीर से जोड़ जाती हैं लकीरें।।

सोचती हूँ कभी-कभी थम एक पल को मैं ....
गर, लकीरों का फेर नहीं ज़िंदगी तो
दिल से की कोशिश को अंजाम तक क्यूँ पहुँचाती नहीं लकीरें?
दिन -रात की गई शीद्दत को इन्सान से मिलवाती क्यूँ नहीं लकीरें??
कुछ  न  करने वालों की झोली सुख से कैसे भर जाती हैं लकीरें?
अपने को मिटा,दूजे का साथ क्यूँ निभाती हैं ये धोखेबाज लकीरें???

                                                                                                                                                          DEEPSHREE

Comments

  1. Bahut khubsurat ❤️ keep it up deepti

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  2. You are right Deepti. Bahut sahi soch.. You have given words to everybody's thought process. Last paragraph is very appropriate.. Awesome dear friend. Keep going.

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    1. Thanks alot Honey for ur appreciation and encouragement...

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  3. Beautiful sahi...sab in lakiron ka fair hai........lovely lines....

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    1. Sach mein..Lakreen ki badlati hai insaan ko...

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  4. Bahot sahi.....👍💐🖐️ye lakeeren hi hain jo batati hain ......

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  5. Very true Dear

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