मेरी नन्ही गुड़िया


 बिस्तर पर रखी एक गुड़िया ,प्यार भरी यादों की है पुड़िया ।।


बैठी वह बन दोस्त मेरी ।
सुनती समझती हर बात वह मेरी ।।

शांत है ,मौन है करती दुखों को पस्त।
दुनियादारी की फिक्र नहीं, अपनी ही दुनिया में है मस्त।।

सीखा उससे हर पल मुस्काना ।
हर कठिनाइयों का करना सामना ।।

जिस दिशा  बिठाओ , बैठी वो  रहती ।
शायद हर पल यादों को 
वो  है कुरेदती ।।

आई वो किसी खास से मिलकर ।
किसी खास के पैगाम को अपने संग लेकर ।।

खास वो पल था ,जो वो आ मिली मुझसे ।
शायद यादों को दूर जाने देना नहीं चाहती है वो मुझसे।।

एक दिन बोली मेरी गुड़िया, है मन में एक सवाल।
मैनें सोचा,ना जाने ये  क्या पूछ करेगी धमाल।।

बोली वो................

मैं बन निर्जीव जीवन को दिशा दिखाती  हूँ।
हर हाल,हर पल में  जीवन को जीए जाती हूँ।।

बिन प्राणों के भी  मेरी गुड़िया जीवन को दिशा दिखाए।
प्राणवायु को किए संचित खुद में मानव, जीवन जीने में सकुचाए ।।

मुस्काती  हर पल, जब से अस्तित्व में है आई ।
शायद है वो बेजुबान ,इसलिए नहीं चखी  उसने दुख की परछाई।।

यही सबक मेरी नन्ही गुड़िया का ।
जीवन को मुस्कान संग जीने का ।। 

                                                                                                                                     DEEPSHREE

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