कैसे कर पाओगे/आखिर कैसे?




खो दिया एक बार तो फिर उसे, कैसे फ़िर  पाओगे?

पा भी गए अगर तो, उससे कैसे निभाओगे?
निभाने के लिए हौसला फिर कहाँ से लाओगे ?
हौसले को इतना बुलंद कैसे बनाओगे?
बुलंदियों पर चढ़े उस रिश्ते को ज़हन में 
फिर कैसे बसाओगे?
चैन  के उस पल को फिर कैसे जिए जाओगे ?
इंसान ही बदल गया तो उसे बदले हुए इंसान को कैसे पा पाओगे?
दिल के उसी कोने में उसे, कैसे  सँजो पाओगे?
कर गया जो खाली जगह, उसे कैसे भर पाओगे ?
उम्मीदों के सैलाब को फिर कैसे रोक पाओगे ?
भरोसा कर भी लो तो इस, कशमकश से बाहर कैसे आओगे?
बीच में बनी दायरो की दीवारों को तुम कैसे  गिरा पाओगे?
लकीरें जो कभी एक थी हो गई उन्हे ,अलग  कैसे कर पाओगे ?
खुशियाँ बटोरी दिल के जिस कोने में, टूटे हुए उस दिल को कैसे संभाल पाओगे?
खुशियाँ  जो सँजो -सँजो  कर बटोरी थी कभी टूटा उन्हें तुम, कैसे देख पाओगे?
कह पाए जिस बात को  बेझिझक कभी तुम, आज क्या उस बात को झिझक के साथ भी तुम  कह  पाओगे? 

                                                                                                                DEEPSHREE

Comments

Post a Comment

भाव के अनुरूप पढ़कर प्रोत्साहित करें l

Popular posts from this blog

नारी: उलझनों में भी उजाला

बेटी का अनकहा दर्द.......

चुभन