गुनाह


              



गुनाह वो कर बैठी ,भरोसा करने का।

इंसान समझेगा दर्द उसका ये विचार करने का।

अपने में पनप रही नन्ही जान को सम्भाले।

दर-दर वो भटक रही थी, बटोर उसके लिए निवाले।

इंसान की क्रूरता ने फिर किया आघात।

भाव तो दूर, किया इंसानियत पर प्रतिघात।

टहल-टहल वो जंगल-जंगल, थी किसी के इन्तज़ार में।

मानव का एक कृत्य कर गया, वार एक फल मात्र से।

जो सक्षम थे,खडे रहे वो मान उसे एक घटना।

खुद पर क्षण भर भी बीतती तो देते नाम दुर्घटना।

वो भी माँ थी,सींच रही थी प्यार से अपने अंश को |

निष्ठुर मानव के निर्दयी चरित्र ने मिटा दिया उसके वंश को।

जैसी करनी वैसी भरनी चाहूँ अब हो जाए।

दिया उसे इस दर्द को जिसने वो भी वैसा पाए ।


                                                          DEEPSHREE



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