सुई-धागा


सुई-धागा ,एक ऐसा भी हो।

जो कतरन नहीं ,ज़ख़मों को  सिल दे।

जो कपड़े को नहीं, इंसान को  बना दे।

जो जहाँ मुड़े ,वहाँ छाप छोड़े।

जो  टूटे हुए, एहसासों को जोड़े।

जो जोड़े नए तार संग पुराने को।

जो बतलाए एहमियत नए को ,पुराने की

जो चुभे ग़र ,तो आख़िर में ज़ख़मों की  मरम्मत कर दे।

जो गुजरे एक छोर से तो दूसरे छोर को पहले से जोड़ दे।

जो इंसान के रंग के मुताबिक़ ,उससे व्यवहार करे।

जो जुड़ने की कसक को अधूरा न छोड़ दे।

जो जोड़े इतना मज़बूत कि रिश्ता अटूट कर दे।

जो कर पक्का हौंसला इंसान की तक़दीर ही बदल दे।

                                                                 DEEPSHREE



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