नारी: उलझनों में भी उजाला
नारी आज की सुलझाती है सब कुछ , पर खुद में उलझ जाती है । सवालों के जवाब सभी के खोजकर लाने वाली , अक्सर, खुद से किए सवालों में उलझ जाती है। मुस्कुराने को जीने का अंदाज़ बताने वाली , तकिये में कभी-कभी मुँह दबाकर चुप-चुप रोती है। सपनों को सभी के नए आयाम तक पहुँचाने वाली , अक्सर , अपनी उड़ान के पंखों को उलझी सी दिशा देती है। पहचान को अपने दम पर बनाने वाली , कभी-कभी अपने ही किसी कोने में अपनी अनकही पहचान खोजती है। सुकून के हर पल को परिभाषित करने वाली , अपने व्यक्तित्व की परिभाषा के लिए शब्द खोजती है। लिखा जो कुछ भी सच वो भी है , पर वो भी जो लिखने जा रही हूँ। नारी वो है.... जो अविश्वास को , विश्वास में बदलने की ताकत रखती है। वो है.... जो उड़ते पक्षी के अंदाज़ को देखकर , उसकी मंज़िल का पता लगा लेती है। वो है.... जो बार-बार हारकर भी , जीत की नई मिसाल बना देती है। वो है.... जो जीवन की हर मुश्किल को किस्मत के सहारे...

Very true... lines have deep meaning.
ReplyDeleteThanks mam👍👍
DeleteSahi me
ReplyDeleteVery right, I wish, the purity should remain as designed by nature
ReplyDeleteExactly...
DeleteKya baat kya baat kya baat
ReplyDeletethis is so beautifully expressed. ..so true so nice
ReplyDeleteThanks alot for ur ur encouraging words..
DeleteBeautiful ❤️
ReplyDeleteThanks 💐
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