माँ
पृथ्वी , भू , आकाश से पहचान कराई उसने।
अच्छा, बुरा-भला क्या है ? यह समझाया उसने।।
रिश्ते ,नाते संबंधियों से मिलवाया उसने।
गिरकर टूटने पर समझा, अौर संभाला उसने।।
कामयाबी न चढ़े सिर यह, समझाया उसने।
द्वेष , कलह से परे प्रेम ,वात्सल्य से मिलवाया उसने।।
कहती है, मैं हूँ खड़ी चलती चल, डर नहीं।
ये शब्द सुन,दिल आज तक डरा किसी से भी नहीं।।
ज़िन्दगी की कठिनाइयों को अपने सिर ले मुसकाती है।
वो माँ है मेरी,इसलिए यही बात दिल को छू जाती है।।
एहसान है उसका,जिससे जीवन धनवान है।
मात्र इससे ही,लगता जीवन अपना मूल्यवान है।।
वो ख़ास है, बहुत ही ख़ास।
उसी से बंधी है , जीवन की हर आस।।
सोचा, उसे शब्दों में बटोर लूँ,पर क्या करूँ? स्तब्ध हूँ।
निष्कर्ष यही पाया वो, वो है जिसके कारण मैं हूँ।।
अस्तित्व की परिचायक है वो
वो ख़ास , बहुत ही ख़ास
वो मेरी सिर्फ़ मेरी
माँ है
DEEPSHREE
Speechless 😇 ...aap aise hi likhte raho
ReplyDelete👏👏👏
ReplyDeleteVery true....👍🏻👍🏻
ReplyDeleteWow
ReplyDeletethanks
DeleteVery Nice
ReplyDeleteSuperb
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