दिल ❤️ या दिमाग़ 🧠
देता खुदा गर दिल और दिमाग़ में से इक चीज़।
ख़ुश रहता इंसान हर पल, न समझता ख़ुद को नाचीज़।।
दोनों के तार हमसे इस क़दर जुड़े ।
सोच- सोच इंसान के परखच्चे उड़े।।
दिल कहे मेरी सुन ,खुशी है मुझसे।
दिमाग़ कहे सुन मेरी, असलियत है मुझसे।।
दिल ने जब -जब दिया दर्द और ग़म ।
दिमाग़ ने भी कर ही डाली आँखें मेरी नम।।
दिमाग़ ने ,पनपी सोच गर बदल डाली।
दिल ने इंसान की शख़्सियत ही हिला डाली।।
दिल खुबसूरती को अपने में समेटना चाहे तो।
दिमाग़ उसी के मायने को परखना चाहे।।
तकलीफ़ों को बढ़ाने में न दिल कम है न दिमाग़ ।
उम्र बीती जा रही है, रखते -रखते इसका हिसाब।।
कौन है मददगार, कौन है ज़रूरी?
असमंजस में हूँ, किसे संग रहने को दूँ मंज़ूरी।।
दिल,ख़ुशियों और चाहत का ताना-बाना बुनता चला,और
दिमाग़ उन्हीं ख़ुशियों और चाहत का नफ़ा -नुक़सान लगाता चला।।
दिल ,दिमाग़ की इस जंग में।
मनुष्य फँसा इस द्वन्द में।।
दिल पल-पल ख़ुशियों को अपनाए पर।
दिमाग़ ख़ुशियों को पल- पल आज़माए।।
इस द्वन्द ने इंसान को दिया कम, लिया ज़्यादा।
यक़ीनन इसका हुआ इंसान को फ़ायदा कम, नुक़सान ज़्यादा।।
DEEPSHREE
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